श्रीमदभगवद्गीता में कर्मयोग – निरुपण

Jaipal Singh Rajpoot

Abstract


प्रस्‍तुत शोध अध्‍ययन का उद्देश श्रीमदभगवदगीता में वर्णित कर्मयोगका निरूपण करना है ! कर्म क्‍या है ? अकर्म क्‍या ? विकर्म क्‍या है ? कर्मफल सिध्‍दांत क्‍या है ? कर्मबंधन से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है ? क्‍या मानव जीवन में कर्मो के बंधन से युक्‍त होने के लिए संन्‍यासी हो जाता उपयुक्‍त है अथवा समता का भाव प्राप्‍त करके कर्मों को करना ? वह कौन सी विधि है जो कर्मो व्‍दारा ही मानव जीवन का सर्वोच्‍च लक्ष्‍य प्राप्‍त कराने में सहायकहै ? मानव जीवन एक निश्चित अवधि के लिए प्राप्‍त होताहैइस अवधि में मनुष्‍य को ऐसे कौन से श्रेष्‍ठ कर्मकरने चाहिएजिससे कर्मबंधन (जन्‍म – मरण)से मुक्‍त होकर सर्वोच्‍च लक्ष्‍य (ईश्‍वर-साक्षात्‍कार) को प्राप्‍त कर सके !  इसी उद्देश से प्रस्‍तुत शोध अध्‍ययन व्‍दारा भगवद्गीता में वर्णित उन श्‍लोको को प्रकाश में लाना है जिसका अनुसरण करके मनुष्‍य आध्‍यात्मिक उत्‍थान (उत्‍कर्ष) को प्राप्‍त कर सकता है !


Keywords


श्रीमदभगवद्गीता, कर्मयोग, निरुपण

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