संस्कृत साहित्य के अनुसार शोध की प्रकृति

Menakarani Sahoo

Abstract


साहित्य के माध्यम से मानव के अंतःकरण की अनुभूतियों का प्रकटन होता है । इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है । साहित्य के सम्बन्ध साहित्यकार के शब्द, अर्थ, विचार, भाव, कल्पना आदि से है । साहित्यकार अपनी साहित्य में मन को आनंद देने वाली कथा की कल्पना करता है । इसके साथ ही पाठक को जीवन का रहस्य, जीवन के उपयोगी तत्वों तथा जीवन के लक्ष्य को अन्वेषण करने के लिए प्रेरित करता है । साहित्य में व्यक्ति, प्रकृति, संस्कृति, समाज, देश, प्रशासन, न्याय एवं नीति आदि तथ्य पर विचार किया जाता है । सनुष्य की हर समस्या का समाधान शोध से हो सकता है । शोध के पर्यायवाची शब्द अनुसंधान, अन्वेषण, रिसर्च, गवेषणा, समीक्षा तथा अनुशीलन है । मानव के विकास का कारण है उसका ज्ञान के अनुसार अनुप्रयोग । शोध के माध्यम से उसको नवीन ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही पहले से प्राप्त ज्ञान की सत्यता की परीक्षण हो जाती है । वैदिक काल से शोध की परम्परा चली आई है । प्राचीनकाल में चरक ने  आयुर्वेद पर वैज्ञानिक अनुसंधान करके वनौषधियों के चिकित्सीय गुणों का ज्ञान लाभ किये थे । महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेदभाष्यभूमिका और सत्यार्थ प्रकाश लिखकर विज्ञान के अनेक सिद्धांतो की चर्चा की है । इससे यह ज्ञात होता है की शोध से हि ज्ञान में स्थिरता आती है ।


Keywords


शोध, अनुसंधान, गवेषणा, योजन, युग

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References


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